🌹प्रेम से जिसके हृदय को प्रेम है🌹🌹
🌹जो हृदय कष्ट के लिए आतुर है 🌹🌹
🌹बिना सोचे जो मरने को तैयार है 🌹🌹
🌹छोड़ पतवार डूबता जो मझधार है 🌹🌹
🌹उसी हृदय को बस प्रेम का अधिकार है🌹🌹
🌹प्रेम से जिसके हृदय को प्रेम है🌹🌹
🌹जो हृदय कष्ट के लिए आतुर है 🌹🌹
🌹बिना सोचे जो मरने को तैयार है 🌹🌹
🌹छोड़ पतवार डूबता जो मझधार है 🌹🌹
🌹उसी हृदय को बस प्रेम का अधिकार है🌹🌹
मैं उपासना शबरी की 🦋
मैं दृढ़ता उर्मिला की
मैं प्रतीक्षा अहिल्या की
मैं सहनशीलता सीता की
मैं शपत पांचाली केश की
मैं पुत्र तपस्या कुंती की
मैं सौ सूत क्षति गाँधारी की
मैं सत् हठिता सावित्री की🦋
मैं पति आज्ञा मांडवी की
मैं विदुषिता अनुसूया की
मैं अवहेलना यशोधरा की
मैं पुनीता सुलोचना की
मैं भक्ति लगन मीराँ की
मैं प्रेम पराकाष्ठा राधा की
मैं हूँ हर कथा नारी की🦋
🌹 हे घन मेघदूत
🌹 कालीदास के
🌹 सुनो पुकार
🌹 द्रवित हृदय
🌹 लगाए गुहार
🌹 नहीं बरसों अभी
🌹 धरा पर है सकुचाई
🌹 नहीं आगमन
🌹 सदैव तुम्हारा
🌹 होता फलदायी
🌹 शीत बढा है अभी
🌹 धरा पर लौट जाओ
🌹 आना जब आए
🌹 श्रावण मास
🌹 मत सताओ
🌹 गाएगें तब मिल के
🌹 राग मल्लार
🌹 अभी तुम लौट जाओ
मेरी तन्हाईयों की शक्ल हो तुम
खयालों के औजारों से तराशी
यादों की नक्काशी से सजी
तमाम उम्र की फुर्सत से बनी
इंतजार के मोतियों की सजी
अरमानों के जेवर पहनाकर
उतार पाया हूँ दिल का खालीपन
तब कहीं निखार ला पाया हूँ
तमाम मोहब्बत से बेपनाह हुस्न पर
कभी नहीं स्थिर रहती
कैसी छाया हो
कभी ना मुझसे मिलती
कैसी काया हो
कभी ना तुम मुरझाती
नहीं हो मेरी फिर भी
रोज मेरी बन जाती
मुझसे ही सजती सँवरती
फिर भी मुझे सताती
तुम मेरी हो वो कल्पना
नित यौवन चढती जाती
रोज राह देखत शबरी
आवत मोरे राम
अब तो शबरी बनी अहिल्या
थक गई मेरे राम
अहिल्या बन भी जुग बीता
कब आओगे राम
बाकी रहा अब बन सीता
समा जाऊं धरती पाश
तुम ना आओ प्रभु मेरे तो
मैं आऊँ साकेत धाम
मैं हूँ प्रतीक्षा लम्बे युग की
मैं मूरत पत्थर की
भरो इसमें तुम संवेदना
बना दो मुझको नारी
सदियां बीती राह देखते
लो डगर इधर की
बनो वैद्य समझो वेदना
हरो पीड़ा मन की
लाख कमियां है मुझ में
एक खूबी तुझे चाहने की है
बचना है लाख कमियों से तुझे
या तमन्ना एक खूबी पे मरने की है
जल जाऊं तेरे ही ईर्द-गिर्द
यह हसरत इस परवाने की है
बता शमा जलना है रोशनी के लिए
या नियत मेरे साथ बुझने की है