शनिवार, 16 जनवरी 2021

अनकही


तुम समझ पाते मेरी अनकही बातों को 

जो मैं नहीं कह पाई तुमसे मिलकर भी 

काश तुम समझ पाते उन जज्बातों को 

जो मैं नहीं दे पाई तुम्हें सब दे कर भी

नहीं बता पाई बहुत कुछ बताना था तुम्हें

नहीं बोल पाई बहुत कुछ कहना था तुम्हें 

फिर भी खुश हूँ मैं ये सोच कर के 

इश्क में रहती है चाहते जिनकी अधूरी 

होता है इश्क भी मुकम्मल उन्ही का



शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

ख्वाहिश

जिम्मेदारियों के आकाश में 

ख्वाहिशें उड़ गई सलीके से 

फरमाइशे आकर अपनो की 

सज गई हसरतों में करीने से




बुधवार, 13 जनवरी 2021

छलावा


तुम कैसा हो छलावा 

छलने आते हो रोज मुझे 

तुम कैसा हो साया 

कभी ना मिल पाते हो मुझे 

तपते सेहरा का पानी हो तुम 

कभी ना ठहर पाते हो तुम 

प्यासी मरू की बूंद हो तुम 

पल भर में खो जाते हो तुम 

हाँ तुम हो बस ख्याल मेरा 

फिर भी रहते सदा साथ मेरे 

हां तुम हो निशी स्वप्न मेरे 

जिसके बिना निशा अधूरी मेरी 

तुम हो अति प्रिय मुझे इतने 

सजते हो रोज तुम मुझसे 

उंढेल भावरस तुझ में सारा 

भरती हूँ मन उमंगों से सारा 

नहीं रहो यदि तुम जीवन में मेरे 

खुद को सुखी मरू मैं पाती 

चलती हूँ नित साथ मैं तेरे 

रहते हो हर पल तुम साथ मेरे 

नदिया में तुम सागर हो नीला 

उद्भव मुझे तुमसे ही अंत मिला

सोमवार, 11 जनवरी 2021

प्रेम


🌹प्रेम नहीं जाता कहीं 

🌹रहता है हमेशा 

🌹ह्रदय के उस कोने के 

🌹किवाङों के पीछे 

🌹जहां नहीं पहुंच पाता 

🌹कोई सिवाय आपके 

🌹और उसकी स्मृतियों के 

🌹यही स्मृतियां 

🌹आपके प्रेम को 

🌹जीवंत रखती है 

🌹उसकी स्मृतियों में भी

शनिवार, 9 जनवरी 2021

Lamhe

 वो दिन भी क्या दिन होते थे         🖤🤍🖤

जब फुर्सत को भी बड़ी फुरसत होती थी 

गुजारे जो नहीं गुजरती थी           🖤🤍🖤

दोपहर इतनी लंबी होती थी         🖤🤍🖤

तब जज्बातों को जीने का सहारा किताबें होती थी             🖤🤍🖤🤍🖤🤍🖤🤍🖤

और गुफ्तगू करने के लिए चाय की प्याली होती थी             🖤🤍🖤🤍🖤🤍🖤🤍🖤



शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

बुदबुदा

बुदगबुदा हूँ पानी का हूँ क्षणभंगुर 

हवा हूँ आते ही पानी हो जाऊँ गुम 

अस्तित्व नहीं मेरा स्थिर 

पल में बनूं खो जाऊं पल में 

किस पर करूं अभिमान 

ना तरलता ना बहाव मेरा 

जो भी है सब पानी 

मैं कहाँ हूँ मुझमें है पानी 

बनु पानी से मिटूं पानी पे 

जीवन मेरा है पानी से


सुदर्शन

जो थे मुजरिम कल तक 

आज न्यायाधीश बनने लगे  

जुल्म पालते रहे जो अब तक

मांग इंसाफ की करने लगे 

उड़ाई धज्जियाँ कर्तव्य की जिन्होने

बात वो अधिकार की करने 

रहा दामन खूनेलहू से सना 

बात वो ही पाक दामन की करने लगे 

बुझा दिए सैकड़ों दिए घरों के 

आज बात चिरागे रोशन की करने लगे 

नहीं जानते वो शिशुपाल 

और सुदर्शन से उलझने लगे





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