बुधवार, 21 अप्रैल 2021

पृथ्वी दिवस

है धरा आज व्यथित 

अंतर्मन शोक से 

कर रही है विलाप 

स्वयं ही क्रदन से

देख दशा मानव की 

पीड़ित है खेद से 

मानव था सच्चा सपूत 

आज आह्लाद है पीड़ से 

बन नासमझ 

विकास की होड़ में 

क्यूँ छला स्वयं को 

अपने ही कर्म से


बुधवार, 7 अप्रैल 2021

मंगल पाण्डेय

जलाकर मशाल क्रांति की 

देश को थमाई थी 

कर आगाज विद्रोह का 

अलख आजादी की जगाई थी 

बन प्रथमेश जागृति का 

आंधी इंकलाब की लाई थी 

सूत्रधार जननायक क्रांति का 

सो गहरी नींद फांसी की 

नींद हमारी उड़ाई थी



रविवार, 28 मार्च 2021

होली


 होली रे होली 

रंगों की डोली 

खुशियों की बारात 

गठजोड़ की रात 

सपनों की सौगात 

संग होली रे होली 

क्यों तूने गौरी 

असुअन बीच 

अखियाँ भिगोली 

विदाई की बेला 

विरह का मेला 

नेहर छूटे साथी छूटे 

बालपने की यादें छूटे

छूटी सारी 

हंसी ठिठोली 

खुशी अवसाद की 

है बिचोली 

होली रे होली 

रंगों की डोली 

साजन मिला 

लाल रंग खिला 

प्रीत मिली 

बगिया  खिली 

एक रंग 

फिर भी छूटा 

खुशियों से मन 

फिर भी रूठा 

खुशी में भी 

आँख भीगोली 

क्यूँ होती है 

होली ऐसी

ऐसी होली

होली

होरी है 

फागोत्सव है 

रंगों का रंगोत्सव है 

कवि है 

कल्पना है 

कवि का महोत्सव है

एक है रंग रंगीली

दूजा है रसीला 

एक रंगों की 

छटा बिखेरती 

दूजा लगता है सजीला 

मदमस्त हो 

एक मीत मिलाती 

दूजा भावों का है मेला

हरे लाल नीले पीले 

रंग है गुलाबी 

हास्य, करुण 

वीर, विभत्स 

नौ रस है श्रृंगारी

हँसते गाते 

खुशियाँ बांटते 

दोनों एक समाना 

भीतर दोनों 

आकुल व्याकुल  

दुख समाए अपारा

एक रंगों की 

नार नवेली 

दूजा श्रृंगार है छबीला

एक विरह 

भरी विरहणी 

एक टूटा नर गर्विला

एक नीर भरी 

दुख की बदली 

दूजा बादल है बोझिला



होली

खेलती हूँ होली रोज 

तेरे अहसासों की 

यादें बरसाती है 

रंग तेरे संग का

तसव्वुर तेरे चेहरे का 

करती है अखियाँ

उड़ता है गुलाल 

हमारी खुशियों का

होता है गुलजार बाग

मेरी तन्हाईयों का


होलिका दहन
दहन बुराई का
विजयोत्सव 
सत्य का 
उत्सव रंगो का
मिलन स्नेह का
आपसी प्रीत का
खुशियों की जीत का
दुखों की हार का
सपनो के संसार का
प्यार के अहसासों का


शुक्रवार, 26 मार्च 2021

महादेवी वर्मा


निहार रही 

अतीत के चलचित्र 

स्मृति की रेखाएं 

बना रही 

स्मृतिचित्र 

पथ के साथी संग 

गाए संध्या गीत 

कैसे बरसी 

नीर भरी बदली 

कैसे बीती दुख की यामा 

जली दीपशिखा 

एक क्षणदा में उभरी 

श्रृंखला की कड़ियां 

खुली गुल्लक 

निकला नीरजा रश्मि कर 

नीलांबर पर ले सप्तवर्ण 

की परिक्रमा नीलकंठ की 

अग्नि रेखाएं 

बनी स्मारिका 

आत्मिका से हो संधीनी 

ने बनाया मेरा परिवार 

हाँ बनाया रचना परिवार

Art work