है धरा आज व्यथित
अंतर्मन शोक से
कर रही है विलाप
स्वयं ही क्रदन से
देख दशा मानव की
पीड़ित है खेद से
मानव था सच्चा सपूत
आज आह्लाद है पीड़ से
बन नासमझ
विकास की होड़ में
क्यूँ छला स्वयं को
अपने ही कर्म से
है धरा आज व्यथित
अंतर्मन शोक से
कर रही है विलाप
स्वयं ही क्रदन से
देख दशा मानव की
पीड़ित है खेद से
मानव था सच्चा सपूत
आज आह्लाद है पीड़ से
बन नासमझ
विकास की होड़ में
क्यूँ छला स्वयं को
अपने ही कर्म से
जलाकर मशाल क्रांति की
देश को थमाई थी
कर आगाज विद्रोह का
अलख आजादी की जगाई थी
बन प्रथमेश जागृति का
आंधी इंकलाब की लाई थी
सूत्रधार जननायक क्रांति का
सो गहरी नींद फांसी की
नींद हमारी उड़ाई थी
रंगों की डोली
खुशियों की बारात
गठजोड़ की रात
सपनों की सौगात
संग होली रे होली
क्यों तूने गौरी
असुअन बीच
अखियाँ भिगोली
विदाई की बेला
विरह का मेला
नेहर छूटे साथी छूटे
बालपने की यादें छूटे
छूटी सारी
हंसी ठिठोली
खुशी अवसाद की
है बिचोली
होली रे होली
रंगों की डोली
साजन मिला
लाल रंग खिला
प्रीत मिली
बगिया खिली
एक रंग
फिर भी छूटा
खुशियों से मन
फिर भी रूठा
खुशी में भी
आँख भीगोली
क्यूँ होती है
होली ऐसी
ऐसी होली
होरी है
फागोत्सव है
रंगों का रंगोत्सव है
कवि है
कल्पना है
कवि का महोत्सव है
एक है रंग रंगीली
दूजा है रसीला
एक रंगों की
छटा बिखेरती
दूजा लगता है सजीला
मदमस्त हो
एक मीत मिलाती
दूजा भावों का है मेला
हरे लाल नीले पीले
रंग है गुलाबी
हास्य, करुण
वीर, विभत्स
नौ रस है श्रृंगारी
हँसते गाते
खुशियाँ बांटते
दोनों एक समाना
भीतर दोनों
आकुल व्याकुल
दुख समाए अपारा
एक रंगों की
नार नवेली
दूजा श्रृंगार है छबीला
एक विरह
भरी विरहणी
एक टूटा नर गर्विला
एक नीर भरी
दुख की बदली
दूजा बादल है बोझिला
खेलती हूँ होली रोज
तेरे अहसासों की
यादें बरसाती है
रंग तेरे संग का
तसव्वुर तेरे चेहरे का
करती है अखियाँ
उड़ता है गुलाल
हमारी खुशियों का
होता है गुलजार बाग
मेरी तन्हाईयों का
अतीत के चलचित्र
स्मृति की रेखाएं
बना रही
स्मृतिचित्र
पथ के साथी संग
गाए संध्या गीत
कैसे बरसी
नीर भरी बदली
कैसे बीती दुख की यामा
जली दीपशिखा
एक क्षणदा में उभरी
श्रृंखला की कड़ियां
खुली गुल्लक
निकला नीरजा रश्मि कर
नीलांबर पर ले सप्तवर्ण
की परिक्रमा नीलकंठ की
अग्नि रेखाएं
बनी स्मारिका
आत्मिका से हो संधीनी
ने बनाया मेरा परिवार
हाँ बनाया रचना परिवार