ढ़ोला जी चुंदड़ी मंगा दो जयपुरियै सूँ
ओढ़नी झीणी सरक सरक जाय
ओढ़े मरवण थारी पर
लाज हूँ मर मर जाय
ढ़ोला जी चुंदड़ी मंगा दो जयपुरियै सूँ
ओढ़नी झीणी सरक सरक जाय
ओढ़े मरवण थारी पर
लाज हूँ मर मर जाय
ये भी ना कहना उत्तरदायी तू नहीं
दिए जो घाव रिस रहें है अब तक
ये ना कहना इनमें हाथ तेरा नहीं
स्वाभिमान हुआ तुझसे ही घायल
तुझसे पसरा ये मौन सन्नाटा नहीं
ये ना कहना उठी जो आँधी मौन की
कण कण इसकी की तैयारी तूने नहीं
बने आज जो ये बवंडर विकराल
किया मौन को भी आह्लादित तूने नहीं
रौंद कर तेरे, कई खार समन्दरी
तब बना ये मरू विशाल नहीं
हुआ शांत गहन नितांत एकाकी
दबा भीतर इसके लाव उबाल नहीं
पर मिला जो तुझसे मौन उपहार मुझे
ये नहीं कि निखरा मेरा आत्मबल नहीं
टूटा था कण-कण हिय का जो सेतू
कैसे कह दूँ बंधा इस मौन मरू से नहीं
हुई थी बंजर देख शब्दों से यहाँ कैसे मानूँ
किया नव अंकुरण मौन ने नहीं
आज निखरा जो तेज मेरे भीतर का
कारण तुझ से मिला मौन है, तू नहीं
मैं सरल
मैं सहज
निभाऊँ प्रीत
जानू ना रीत
तेरे जग की
मैं भोली
अलबेली
मनमौजी
हूँ अपने ही
ढंग की
मैं सलोनी
हूँ साँवली
पर हूँ
सच्ची अपने
मन की
विश्व_आदिवासी_दिवस
चूड़ामणि,सिंहनी
रूप ज्योति अपरम्पार
केशकला,काली अलकाएँ
हिरणी नैनन कली कचनार
यौवन गागर छलके छल छल
रूप नीर भरमार
रूपमती पद्मावती
साहस की भंडार
केसरी, बनी केसरी
हुई सिंदूरी केसरिया
जौहर की वेदी चढ़
हाथ ना आई चपल हिरणिया
ओढ़ केसर चुनर,
बन गई वो तो केसर अगनिया
बनी शान, बचाई आन
मेवाड़ी मान हुआ निहाल
रूप की गागर केसर क्यारी
केसरी पाग पे हो गई वारि
सच्ची वीरांगना
सच्ची क्षत्राणी
राजस्थानी आन केऊँ
राजपूताना मान केऊँ
दान देबा री सीमा तोड़ी
थानेह दानवीर महान केऊँ
अजमेर रो बल केऊँ
दिल्ली रो दर्द केऊँ
जयचंद अभिशाप बण्य्यो
संयोगिता रो संयोग केऊँ
सिंह री धाकल केऊँ
गज की चिंघाड़ केऊँ
बाज की निजराँ थारी
थनअ क्षत्रिय महान केऊँ
पुरुष को पौरुष केऊँ
बलशाली बल केऊँ
नाम लेता शत्रु धूजअ
शत्रु रो कंपन्न केऊँ
तलवार री धार केऊँ
बरछी और कटार केऊँ
हर शस्त्र है धार थारी
थनह तीर भाल केऊँ
तोप री गूंजन केऊँ
आँख रो अंजन केऊँ
गौरी रो गरब तोड्य्यो
थनह गरब भंजन केऊँ
थनह शासक महान केऊँ
राजपूती ईमान केऊँ
अजमेरी मान बढायो
थनह पृथ्वीराज चौहान केऊँ